wikiwi
🇰🇷
🇺🇸
🇪🇸
🇮🇳
🇯🇵
अष्टाङ्गहृदयम्
S4
guest-hbdxz
2026-05-27 00:11:05
# अष्टाङ्गहृदयम् अष्टाङ्गहृदयम्, आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके रचयिता महर्षि लघु वाग्भट हैं। इसका रचनाकाल ५०० ईसापूर्व से लेकर २५० ईसापूर्व तक अनुमानित है। इस ग्रन्थ में औषधि (मेडिसिन) और शल्यचिकित्सा दोनो का समावेश है। यह एक संग्रह ग्रन्थ है, जिसमें चरक, सुश्रुत, अष्टांगसंग्रह तथा अन्य अनेक प्राचीन आयुर्वेदीय ग्रन्थों से उद्धरण लिये गये हैं। वाग्भट ने अपने विवेक से अनेक प्रसंगोचित विषयों का प्रस्तुत ग्रन्थ में समावेश किया है। चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता और अष्टाङ्गहृदयम् को सम्मिलित रूप से वृहत्त्रयी कहते हैं। अपनी विशेषताओं के कारण यह ग्रन्थ अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। अष्टांगहृदय में आयुर्वेद के सम्पूर्ण विषय- कायचिकित्सा, शल्यचिकित्सा, शालाक्य आदि आठों अंगों का वर्णन है। उन्होंने अपने ग्रन्थ के विषय में स्वयं ही कहा है कि, यह ग्रन्थ शरीर रूपी आयुर्वेद के हृदय के समान है। जैसे- शरीर में हृदय की प्रधानता है, उसी प्रकार आयुर्वेद वाङ्मय में अष्टांगहृदय, हृदय के समान है। (अर्थ: इधर-उधर (प्रकीर्ण) विक्षिप्त उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम से उत्तम (सार) भाग को लेकर यह संग्रह किया गया है। इस संग्रह ग्रंथ का नाम अष्टांगहृदय है। इसमें वर्णित विषय न अत्यन्त संक्षेप से और न अत्यन्त विस्तार से कहे गये हैं।) कुछ विद्वान अष्टाङ्गसंग्रह और अष्टाङ्गहृदय एक ही वाग्भट की रचना स्वीकार करते हैं, उनमें अरुणदत्त एवं इन्दु हैं। इन्दु अष्टाङ्गहृदय को पहले और अष्टङ्गसंग्रह को बाद की रचना मानते हैं। परन्तु अन्य सभी मतों के अनुसार अष्टाङ्गसंग्रह की रचना पहले हुई थी। अष्टयङ्गसंग्रह में भाषा की कठिनता है तथा विषय विस्तृत है जबकि अध्यङ्गहृदय की भाषा सरल तथा स्पष्ट है। संग्रह की भाषा कठिन, अनेक छन्दों वाली, ऐतिहासिक भौगिलिक और सामाजिक है। ग्रन्थ की कठिनता विषयों का विस्तार ही है। जबकि अष्टाङ्गहृदय संक्षिप्त, सरल और केवल पद्यमय है। इसकी सरलता के कारण इसका प्रचार अधिक हो गया। अष्टाङ्गहृदय आयुर्वेद का सार कहना अनुचित नहीं होगा। इसमें चिकित्सा सम्बन्धी सभी तथ्यों के व्यवहारिक पक्ष का समावेश किया गया है। कुछ तथ्यों का उल्लेख निम्नवत् है- अष्टांगहृदय में 6 खण्ड, 120 अध्याय एवं कुल 7120 श्लोक हैं। अष्टांगहृदय के छः खण्डों के नाम निम्नलिखित हैं- (०१) आयुष्कामीयः (०२) दिनचर्या (०३) ऋतुचर्या (०४) रोगानुत्पादनीयः (०५) द्रवद्रव्यविज्ञानीयः (०६) अन्नस्वरूपविज्ञानीयः (०७) अन्नरक्षा (०८) मात्राशितीयः (०९) द्रव्यादिविज्ञानीयः (१०) रसभेदीयः (११) दोषादिविज्ञानीयः (१२) दोषभेदीयः (१३) दोषोपक्रमणीयः (१४) द्विविधोपक्रमणीयः (१५) शोधनादिगणसङ्र्नहः (१६) स्नेहविधिः (१७) स्वेदविधिः (१८) वमनविरेचनविधिः (१९) बस्तिविधिः (२०) नस्यविधिः (२१) धूमपानविधिः (२२) गण्डुषादिविधिः (२३) आश्चोतनाञ्जनविधिः (२४) तर्पणपुटपाकविधिः (२५) यन्त्रविधिः (२६) शस्त्रविधिः (२७) सिराव्यधविधिः (२८) शल्याहरणविधिः (२९) शस्त्रकर्मविधिः (३०) क्षाराग्निकर्मविधिः । (१) गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः (२) गर्भव्यापद्विध्यध्यायः (३) अङ्गविभागशारीराध्यायः (४) मर्मविभागशारीराध्यायः (५) विकृतिविज्ञानीयाध्यायः (६) दूतादिविज्ञानीयाध्यायः । (१) सर्वरोगनिदानाध्यायः (२) ज्वरनिदानाध्यायः (३) रक्तपित्तनिदानाध्यायः (४) श्वासहिध्मानिदानाध्यायः (५) राजयक्ष्मादिनिदानाध्यायः (६) मदात्ययादिनिदानाध्यायः (७) अर्शोनिदानाध्यायः (८) अतीसारग्रहणीरोगनिदानाध्यायः (९) मूत्राघातनिदानाध्यायः (१०) प्रमेहनिदानाध्यायः (११) विद्रधिवृद्धिगुल्मनिदानाध्यायः (१२) उदरनिदानाध्यायः (१३) पाण्डुरोगशोफविसर्पनिदानाध्यायः (१४) कुष्ठश्वित्रकृमिनिदानाध्यायः (१५) वातव्याधिनिदानाध्यायः (१६) वातशोणितनिदानाध्यायः । (१) ज्वरचिकित्सिताध्यायः (२) रक्तपित्तचिकित्सिताध्यायः (३) कासचिकित्सिताध्यायः (४) श्वासहिध्माचिकित्सिताध्यायः (५) राजयक्ष्मादिचिकित्सिताध्यायः (६) छर्दिहृद्रोगतृष्णाचिकित्सिताध्यायः (७) मदात्ययादिचिकित्सिताध्यायः (८) अर्शश्चिकित्सिताध्यायः (९) अतीसारचिकित्सिताध्यायः (१०) ग्रहणीदोषचिकित्सिताध्यायः (११) मूत्राघातचिकित्सिताध्यायः (१२) प्रमेहचिकित्सिताध्यायः (१३) विद्रधिवृद्धिचिकित्सिताध्यायः (१४) गुल्मचिकित्सिताध्यायः (१५) उदरचिकित्सिताध्यायः (१६) पाण्डुरोगचिकित्सिताध्यायः (१७) श्वयथुचिकित्सिताध्यायः (१८) विसर्पचिकित्सिताध्यायः (१९) कुष्ठचिकित्सिताध्यायः (२०) श्वित्रकृमिचिकित्सिताध्यायः (२१) वातव्याधिचिकित्सिताध्यायः (२२) वातशोणितचिकित्सिताध्यायः । (१) वमनकल्पाध्यायः (२) विरेचनकल्पाध्यायः (३) वमनविरेचनव्यापत्सिद्ध्यध्यायः (४) बस्तिकल्पाध्यायः (५) बस्तिव्यापत्सिद्ध्यध्यायः (६) द्रव्यकल्पाध्यायः । (०१) बालोपचरणीयाध्यायः (०२) बालामयप्रतिषेधाध्यायः (०३) बालग्रहप्रतिषेधाध्यायः (०४) भूतविज्ञानीयाध्यायः (०५) भूतप्रतिषेधाध्यायः (०६) उन्मादप्रतिषेधाध्यायः (०७) अपस्मारप्रतिषेधाध्यायः (०८) वर्त्मरोगविज्ञानीयाध्यायः (०९) वर्त्मरोगप्रतिषेधाध्यायः (१०) सन्धिसितासितरोगविज्ञानीयाध्यायः (११) सन्धिसितासितरोगप्रतिषेधाध्यायः (१२) दृष्टिरोगविज्ञानीयाध्यायः (१३) तिमिरप्रतिषेधाध्यायः (१४) लिङ्गनाशप्रतिषेधायाध्यायः (१५) सर्वाक्षिरोगविज्ञानीयाध्यायः (१६) सर्वाक्षिरोगप्रतिषेधाध्यायः (१७) कर्णरोगविज्ञानीयाध्यायः (१८) कर्णरोगप्रतिषेधाध्यायः (१९) नासारोगविज्ञानीयाध्यायः (२०) नासारोगप्रतिषेधाध्यायः (२१) मुखरोगविज्ञानीयाध्यायः (२२) मुखरोगप्रतिषेधाध्यायः (२३) शिरोरोगविज्ञानीयाध्यायः (२४) शिरोरोगप्रतिषेधाध्यायः (२५) व्रणप्रतिषेधाध्यायः (२६) सद्योव्रणप्रतिषेधाध्यायः (२७) भङ्गप्रतिषेधाध्यायः (२८) भगन्दरप्रतिषेधाध्यायः (२९) ग्रन्थ्यर्बुदापचीनाडीविज्ञानीयाध्यायः (३०) ग्रन्थ्यर्बुदापचीनाडीप्रतिषेधाध्यायः (३१) क्षुद्ररोगविज्ञानीयाध्यायः (३२) क्षुद्ररोगप्रतिषेधाध्यायः (३३) गुह्यरोगविज्ञानीयाध्यायः (३४) गुह्यरोगप्रतिषेधाध्यायः (३५) विषप्रतिषेधाध्यायः (३६) सर्पविषप्रतिषेधाध्यायः (३७) कीटलूतादिविषप्रतिषेधाध्यायः (३८) मूषिकालर्कविषप्रतिषेधाध्यायः (३९) रसायनविध्यध्यायः (४०) वाजीकरणविध्यध्यायः । अष्टाङ्गहृदयम के कुछ प्रमुख अध्यायों में वर्णित मुख्य विषय निम्नलिखित हैं- अष्टांगहृदय पर प्रसिद्ध सर्वाङ्गसुन्दरा टीका लिखने वाले अरुणदत्त मृगांकदत्त के पुत्र थे। वे एक बहुमुखी प्रतिभा से युक्त विद्वान थे, जिन्हें प्राचीन विद्या की कई शाखाओं का व्यापक ज्ञान था। ऐसा कहा जाता है कि वे बंगाल के मूल निवासी थे और हेमाद्रि से पहले 13वीं शताब्दी के आरंभिक काल में रहते थे। हेमाद्रि ने अष्टांगहृदय पर आयुर्वेदरसायन नामक टीका लिखी। वे देवगिरि के राजा महादेव (शासनकाल 1260 – 1271 ई०) तथा उनके उत्तराधिकारी राजा रामदेव (शासनकल 1271 – 1309 ई०) के श्रीकरणाधिप (मन्त्री एवं महालेखाकार) थे। इनके अतिरिक्त चन्द्रनन्दन (१०वीं शताब्दी ई०) ने पदार्थचन्द्रिका नामक टीका लिखी है। इन्दु (९वीं-१०वीं शताब्दी ई०) ने इन्दुमती नामक टीका लिखी। शिवदास सेन (१५वीं शताब्दी ई०) ने तत्त्वबोध नामक टीका लिखी है। दामोदर रानडे (१७वीं शताब्दी ई०) ने सङ्केतमञ्जरी नामक टीका लिखी है। अष्टाङ्गहृदय का अरबी अनुवाद आठवीं शताब्दी में बगदाद में प्राप्त हुआ। वैडूर्यकभाष्य तिब्बती भाषा में प्राप्त होता है। इसका जर्मन अनुवाद भी "Vāgbhaṭa's Aṣṭāṅgahṛdayasaṃhitā : Ein altindisches Lehrbuch der Heilkunde" नाम से 1941 में प्रकाशित हुआ। शास्त्र में वर्णन करने योग्य विषयों को अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट करने हेतु अनेकों कल्पनाएँ की जाती है (योजनाएँ बनायी जातीं हैं), जिससे विषय का ज्ञान सरलता से हो सके। अरुणदत्त ने सर्वांगसुन्दरा में निम्नस्थ सात कल्पनाएँ मानी है- १. प्रधानस्य कल्पना - किसी कार्यविशेष के लिए उस कार्य की सम्पन्नता हेतु जो प्रधान द्रव्य है, उस द्रव्य द्वारा जो कल्पना की जाती है, वह प्रधान कल्पना है । जैसे "सर्पिः स्नेहनं क्षीरं जीवनम" (घृत स्नेहन तथा दुग्ध जीवन है) । यहाँ स्नेहन तथा जीवन हेतु घृत एवं दुग्ध द्वारा जो कल्पना होती है, वह प्रधान कल्पना है । स्नेहन तथा जीवन तर एवं जल आदि मे नहीं कहा जाता है । २. प्रधानेन कल्पना - जैसे क्षीर, दधि, तक्र, मस्तु, नवनीत घृत, पुराण घृत, किलाट, पीयूष एवं कूची का मोरटादि वभे सब क्षीरवर्ग कहा गया है । यहाँ क्षीर की प्रधानता में प्रधान से कल्पना की गई है और सब क्षीरवर्ग कहा गया है। ३. गुणकल्पना नाम - जिस धर्म से युक्त होने पर समथे माना जाता है, उस धर्म से युक्त अगुण होते हए भी गुण माना जाता है। जैसे चिकित्सा के चार पाद है, चिकित्सक में दक्षत्व आदि कल्पना गुण कल्पना है । ४. लेशकलत्पना नाम - "अनुपदिष्टस्य विधेः कण्ठपाठेन यत्किञ्चित् सूत्रावयवान्तरमाश्रित्यार्थः कल्प्यते" (जिस विधि को स्पष्ट रूप से न कहा गया हो, परन्तु सूत्र के अन्तर्गत आने वाले पद से कल्पना की गई हो, वह केश कल्पना है।) जैसे- आयुर्वेद मे कालाकाल मृत्यु का स्पष्ट लक्षण नहीं कहा गया है, परन्तु वाक्य के अन्तर्गत पदों से अर्थ निकाला जाता है। ५. विद्याकल्पना नाम - अन्य शास्त्रों मे वर्णित विषय को अपने शास्त्र में हितकर सिद्ध करना विद्या कल्पना है। यथा- "अर्चयेद् देवगोविप्र" यह धर्मशास्त्र का उपदेश सद्वृत्त प्रकरण में अष्टांगहृदय ने स्वीकार कर लिया। ६. भक्ष्यकल्पना नाम - किसी भक्ष्य ( आहार ) के विषय में यह कहना कि "एतत् तदमृतं साक्षात्" ( अष्टांगहृदय, उत्तरतन्त्र ४०।७५ ) अर्थात् 'यह साक्षात् अमृत है', यह भक्ष्यकल्पना है। ७. आज्ञाकल्पना नाम - बिना किसी हेतु के आप्तों के वाक्यों के आधार पर जो विधि या निषेध किया जाता है, वह आज्ञाकल्पना है। जैसे पृथ्वी पर लिखना नहीं चाहिए तथा तिनकों को नाखून से नहीं काटना चाहिए, इत्यादि । ध्यातव्य है कि तन्त्रयुक्तिकार ने इस प्रकार से कल्पनाएँ बतायीं हैं- इस प्रकार इन्होने तीन अन्य कल्पनाए बतला है, जिनके लक्षण निम्नस्थ हैं- १. इगित कल्पना - यह विद्या कल्पना है । २. विभव कल्पना - पहले कहा जा चुका है, किन्तु यहाँ नहीं कहा गया है, तो उसको यहाँ भी मान लेना विभव कल्पना है । ३. भक्ति कल्पना - भक्ति उपचार लक्षणा है । अर्थात् इस पद का अन्य भी अर्थ निकलता है।
My Wiki Documents
अष्टाङ्गहृदयम्